एक मनोवैज्ञानिक छोटा सा प्रयोग कर रहा था।

 उसने अपनी कक्षा में आकर बड़े ब्लैकबोर्ड पर एक छोटा सा सफेद बिंदु रखा—जरा सा—कि मुश्किल से दिखायी पड़े।

फिर उसने पूछा विद्यार्थियों को कि क्या दिखायी पड़ता है?

किसी को भी उतना बड़ा ब्लैकबोर्ड दिखायी न पड़ा,

सभी को वह छोटा सा बिंदु दिखायी पड़ा—जो कि मुश्किल से दिखायी पड़ता था।

उसने कहा, यह चकित करने वाली बात है।

 इतना बड़ा तख्ता कोई नहीं कहता कि दिखायी पड़ रहा है; सभी यह कहते हैं, वह छोटा सा बिंदु दिखायी पड़ रहा है।

तुम जो देखना चाहते हो, वह छोटा हो तो भी दिखायी पड़ता है।

तुम जो देखना नहीं चाहते, वह बड़ा हो तो भी दिखायी नहीं पड़ता।

तुम्हारी चाह पर सब कुछ निर्भर है। तुम्हारा चुनाव निर्णायक है।

तो मैं तुमसे कहता हूं—इस जीवन में तुम कहते हो दुख पाया बहुत,
अब अगले जन्म में और हमें नर्क न भेजा जाए—कोई भेजने वाला नहीं है।

 लेकिन इस जीवन में अगर तुमने दुख की आदत बनायी, तो तुम नर्क चले जाओगे।
नर्क तुम्हारा जीवन कोण है।
 यह कोई स्थान नहीं है कहीं।
यह तुम्हारे देखने का ढंग है।
 तुम जहां जाओगे, नर्क खोज लोगे। तुम्हारा नर्क तुम्हारे साथ चलता है। तुम्हारा स्वर्ग भी तुम्हारे साथ चलता है।

तुम अभ्यास करना यहीं से शुरू करो। तुम कल की प्रतीक्षा मत करो कि मरने के बाद स्वर्ग जाएंगे।
 अधिक लोग यही भूलकर रहे है—कि मरे,  फिर स्वर्गीय हुए!

अगर जन्म में, जीते—जी नरक में रहे, तो अचानक तुम स्वर्ग में नहीं पहुंच सकते।

कोई छलांग थोड़े ही है कि तुमने एकदम से तय कर लिया और तुम स्वर्ग में चले गए।

 तुम्हारे जिंदगी भर का अभ्यास
तुम्हारी दिशा बनेगा।-
ओशो
एस धम्मो सनंतनो भाग-5 ;
 प्रवचन-47
🌹☀️☀️🙏☀️☀️🌹

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