तुम्‍हारे काम-कृत्‍य, संभोग महज राहत का, अपने को तनाव-मुक्‍त करने का उपाय है !! शिवसूत्र !!


MUMBAI CRIME PAGE: तुम्‍हारे काम-कृत्‍य, संभोग महज राहत का, अपने को तनाव-मुक्‍त करने का उपाय है। इसलिए जब तुम संभोग में उतरते हो तो तुम्‍हें बहुत जल्‍दी रहती है। तुम किसी तरह छुटकारा चाहते हो। छुटकारा यह कि जो ऊर्जा का अतिरेक तुम्‍हें पीडित किए है वि निकल जाए और तुम चैन अनुभव करो। लेकिन यह चैन एक तरह की दुर्बलता है। ऊर्जा की अधिकता तनाव पैदा करती है। उतैजना पैदा करती है। और तुम्‍हें लगता है कि उसे फेंकना जरूरी है। जब वह ऊर्जा बह जाती है तो तुम कमजोरी अनुभव करते हो। और तुम उसी कमजोरी को विश्राम मान लेते हो। क्‍योंकि ऊर्जा की बाढ़ समाप्‍त हो गई उतैजना जाती रही, इसलिए तुम्‍हें विश्राम मालूम पड़ता है।

लेकिन  यह विश्राम नकारात्‍मक विश्राम है। अगर सिर्फ ऊर्जा को बाहर फेंककर तुम विश्राम प्राप्‍त करते हो तो यह विश्राम बहुत महंगा है। और तो भी यह सिर्फ शारीरिक विश्राम होगा। वह गहरा नहीं होगा। वह आध्‍यात्‍मिक नहीं होगा।

यह पहला सूत्र कहता है कि जल्‍द बाजी मत करो और अंत के लिए उतावले मत बनो, आरंभ में बने रहो। काम-कृत्‍य के दो भाग है: आरंभ और अंत। तुम आरंभ के साथ रहो। आरंभ का भाग ज्‍यादा विश्राम पूर्ण है। ज्‍यादा उष्‍ण है। लेकिन अंत पर पहुंचने की जल्‍दी  मत करो। अंत को बिलकुल भूल जाओ।

तीन संभावनाएं है। दो प्रेमी प्रेम में तीन आकार, ज्यामितिक आकार निर्मित कर सकते है। शायद तुमने इसके बारे में पढ़ा भी होगा। या कोई पुरानी कीमिया, की तस्‍वीर भी देखो। जिसमें एक स्‍त्री और एक पुरूष तीन ज्‍यामितिक आकारों में नग्‍न खड़े है। एक आकार चतुर्भुज है, दूसरा त्रिभुज है, और तीसरा वर्तुल है। यक अल्केमी और तंत्र की भाषा में काम क्रोध का बहुत पुराना विश्‍लेषण है।

आमतौर से जब तुम संभोग में होते हो तो वहां दो नहीं, चार व्‍यक्‍ति होते है। वही है चतुर्भुज। उसमे चार कोने है, क्‍योंकि तुम दो हिस्‍सों में बंटे हो। तुम्‍हारा एक हिस्‍सा विचार करने वाला है और दूसरा हिस्‍सा भावुक हिस्‍सा है। वैसे ही तुम्‍हारा साथी भी दो हिस्सों में बंटा है। तुम चार व्‍यक्‍ति हो दो नहीं। चार व्‍यक्‍ति प्रेम कर रहे है। यह एक भीड़ है, और इसमें वस्‍तुत: प्रगाढ़ मिलन की संभावना नहीं है। इस मिलन के चार कोने है और मिलन झूठा है। वह मिलन जैसा मालूम होता है। लेकिन मिलन है नहीं। इसमें प्रगाढ़ मिलन की कोई संभावना नहीं है। क्‍योंकि तुम्‍हारा गहन भाग दबा पडा है। केवल दो सिर, दो विचार की प्रक्रियाएं मिल रही है। भाव की प्रक्रियाएं अनुपस्थित है। वे दबी छीपी है।

वर्तमान में रहो। दो शरीरों के मिलन का सुखा लो,दो आत्‍माओं के मिलने का आनंद लो। और एक दूसरे में खो जाओ। एक हो जाओ। भूल जाओ कि तुम्‍हें कहीं जाना है। वर्तमान क्षण में जीओं, जहां से कहीं जाना नहीं है। और एक दूसरे  से मिलकर एक हो जाओ। उष्‍णता और प्रेम वह स्‍थिति बनाते है जिसमें दो व्‍यक्‍ति एक दूसरे में पिघलकर खो जाते है। यही कारण है कि यदि प्रेम न हो तो संभोग जल्‍दबाजी का काम हो जाता है। तब तुम दूसरे का उपयोग कर रहे हो। दूसरे में डूब नहीं रहे हो। प्रेम के साथ तुम दूसरे में डूब सकते हो।

आरंभ का यह एक दूसरे में डूब जाना अनेक अंतदृष्‍टियां प्रदान करता है। अगर तुम संभोग को समाप्‍त करने की जल्‍दी नहीं करते हो तो काम-कृत्‍य धीरे-धीरे कामुक कम और आध्‍यात्‍मिक ज्‍यादा हो जाता है। जननेंद्रियों भी एक दूसरे में विलीन हो जाती है। तब दो शरीर ऊर्जाओं के बीच एक गहन मौन मिलन घटित होता है। और तब तुम घंटों साथ रह सकते हो। यह सहवास समय के साथ-साथ गहराता जाता है। लेकिन सोच-विचार मत करो, वर्तमान क्षण में प्रगाढ़ रूप से विलीन होकर रहो। वही समाधि बन जाती है। और अगर तुम इसे जान सके इसे अनुभव कर सके, इसे उपलब्‍ध कर सके तो तुम्‍हारा कामुक चित अकामुक हो जाएगा। एक गहन ब्रह्मचर्य उपलब्‍ध हो सकता है। काम से ब्रह्मचर्य उपलब्‍ध हो सकता है।

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